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मुक्त व्यापार पाने का दूसरा तरीका

मुक्त व्यापार पाने का दूसरा तरीका

क्षेत्रीय व्यापार संधियां और मुक्त व्यापार

भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक आर्थिक सहयोग संधि (सीईसीए) में आ रहा धीमापन देश की मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) नीति में आ रही कमजोरी का एक और संकेत है। एफटीए वार्ता में यह धीमापन आंशिक रूप से इसलिए आ रहा है क्योंकि भारत को दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के समूह आसियान से दबाव का सामना करना पड़ रहा है। यह दबाव क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) को निपटाने से संबंधित है। आरसीईपी के देश पिछले छह साल से इस वार्ता में उलझे हुए हैं। यह उलझन काफी हद तक भारत की ओर से सीमित और अलग-अलग टैरिफ उदारीकरण से ताल्लुक रखती है। हाल ही में वस्तु एवं सेवा कारोबार को उदार करने के लिए ऐसी ही एक वार्ता पर जोर दिया गया। अमेरिका-चीन व्यापार युद्घ के माहौल को देखते हुए आसियान के सदस्य आरईसीपी की बातचीत को समाप्त करने के अपने तय लक्ष्य के प्रति गंभीर हैं। वे नवंबर 2018 की आसियान शिखर बैठक में इस पर हस्ताक्षर चाहते हैं। काफी संभावना है कि अगर भारत पहले जैसे हालात बरकरार रखता है तो अन्य सदस्य देश बिना भारत के समझौते पर आगे बढ़ जाएंगे। देश के नीति निर्माता इस संभावना को लेकर सहज हैं लेकिन देश की एफटीए नीति की समीक्षा की आवश्यकता है ताकि हम इस भागीदारी को लेकर सही रुख अपना सकें।

पहली बात, एफटीए को बहुपक्षीय या विश्व व्यापार संगठन की भागीदारी के बरअक्स अनैतिक नहीं माना जाना चाहिए। एफटीए एकदम वैध व्यापारिक तरीका है। इसे जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स ऐंड ट्रेड (गैट) के अनुच्छेद 24 के तहत मंजूरी प्राप्त है। इनकी प्रकृति प्राथमिकता वाली होती है और ये अधिकाधिक देशों के बीच मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने का काम करते हैं। ये डब्ल्यूटीओ के मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के लक्ष्य के अनुरूप ही है। कई विकसित और विकासशील देशों ने बहुपक्षीय व्यापार उदारीकरण के साथ एफटीए को अपना कर लाभ कमाया। सन 2000 के दशक में एफटीए की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। दोहा विकास एजेंडे के तहत डब्ल्यूटीओ की प्रक्रिया धीमी पडऩे के बाद इसमें और प्रगति हुई। कई देशों को यह द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार का आसान जरिया लगा। सन 2000 से 2017 के बीच क्षेत्रीय व्यापार संधियों की संख्या 79 से बढ़कर 287 हो गई। इतना ही नहीं हर वर्ष वस्तुओं ने सेवा क्षेत्र को पीछे छोड़ा। पूर्वी एशिया जो विश्व व्यापार के तीन ध्रुवों में से एक है (दो अन्य हैं यूरोप और उत्तरी अमेरिका), वहां 83 क्षेत्रीय समझौते प्रवर्तन में हैं। यूरोप 97 समझौतों के साथ शीर्ष पर है।

दूसरा, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यापार परिदृश्य में अमेरिका और चीन की कारोबारी जंग छाई हुई है। इस दौरान डब्ल्यूटीओ के तरजीही मुल्क के सिद्घांत की अनदेखी हुई है और इस बात ने बहुपक्षीय व्यवस्था को कमजोर किया है। अमेरिका ने डब्ल्यूटीओ की विवाद निस्तारण अपीलीय संस्था को अवरुद्घ किया है। इससे भी बहुपक्षीय व्यवस्था को ठेस पहुंची है। प्रासंगिकता बनाए रखने के क्रम में डब्ल्यूटीओ अमेरिका और जापान जैसे विकसित देशों के दबाव में ई-कॉमर्स आदि को लेकर नए नियम बना सकता है। वह राज्य आपूर्ति या सब्सिडी कार्यक्रम में पारदर्शिता और सीमा को लेकर नियम प्रस्तुत कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो भविष्य में बहुपक्षीय व्यवस्था में भारत की भागीदारी चुनौतीपूर्ण हो जाएगी। भारत पहले ही निर्यात सब्सिडी कार्यक्रम को लेकर अमेरिका द्वारा उत्पन्न विवाद से जूझ रहा है।

तीसरा, आरसीईपी को एक व्यापक समझौते के रूप में तैयार करने का विचार था जहां वस्तुओं और सेवाओं को लेकर एक साथ बातचीत हो सके। परंतु फिलहाल भारत आसियान के साथ एफटीए के कारण अनावश्यक प्रभाव में आ रहा है। भारत-आसियान सेवा एफटीए पर वस्तु एफटीए के चार साल बाद हस्ताक्षर किए गए। अभी भी इसे सभी सदस्य देशों की मंजूरी का इंतजार है। वस्तु क्षेत्र के एफटीए ने द्विपक्षीय व्यापार को प्रभावित नहीं किया है और व्यापार संतुलन आसियान के पक्ष में है। यह भी सच है कि कुछ आसियान सदस्यों के साथ भारत के व्यापार समझौते का प्रदर्शन अन्य क्षेत्रीय देशों के समक्ष प्रदर्शन से कुछ खास अलग नहीं रहा है। भारत-कोरिया व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) फिलहाल समीक्षाधीन है। भारतीय कारोबारी सख्त नियमों के चलते सीईपीए का पूरा लाभ उठा पाने में नाकामयाब रहे हैं। कोरिया के साथ द्विपक्षीय व्यापार बढ़ा है लेकिन भारत से कोरिया को होने वाला निर्यात स्थिर रहा है।

समीक्षा की प्रक्रिया में जहां नियम आसान किए जाने हैं वहीं सीईपीए का विस्तार सेवा क्षेत्र में करने की बात भी इसमें शामिल है। ये वे सेवा क्षेत्र हैं जो भारत के अनुकूल हैं। उदाहरण के लिए स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा क्षेत्र। चुनिंदा उत्पादों के लिए कोरियाई बाजार की पहुंच सुधारना भी इसके लक्ष्यों में शामिल है। 2011 में सीईपीए पर हस्ताक्षर के बाद से ही भारत-जापान द्विपक्षीय व्यापार में ठहराव रहा या गिरावट आई। मलेशिया के साथ व्यापार भी यही कहानी कहता है। जापान भारत में सबसे बड़ा निवेशकों में से एक है लेकिन आवक का आकार छोटा है और सीईपीए के बाद भी निवेश में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है। सेवा क्षेत्र में व्यापार काफी छोटा है। भारत-सिंगापुर सीईसीए पर 2005 में हस्ताक्षर हुए थे। यहां शुरुआती वर्षों में वस्तु व्यापार में प्रदर्शन अच्छा रहा लेकिन सेवा व्यापार वृद्घि 2015 तक सिंगापुर के अनुकूल रही। निवेश वृद्घि इसलिए दिखी क्योंकि तीसरे मुल्कों ने सिंगापुर के जरिये निवेश किया।

भारत के लिए आरसीईपी वार्ता में मुद्दा वस्तु और सेवाओं के क्षेत्र में उदारीकरण को समान रूप से उठाना नहीं होना चाहिए बल्कि यह देखना होगा कि क्या यह भागीदारी भारत को अहम अवसर मुहैया कराती है या नहीं? चीन से आयात वृद्घि की आशंका को आरसीईपी में घबराहट का मुद्दा नहीं बनने देना चाहिए। प्रतिस्पर्धा को लेकर खुलापन घरेलू उत्पादकों को उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रेरित करेगा। जैसे-जैसे अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्घ बढ़ेगा और कंपनियां चीन से अपनी फैक्टरियां हटा कर अन्य देशों में ले जाएंगी, भारत को विकल्प बनने का अवसर मिलेगा। ऐसा तभी होगा जबकि भारत अन्य क्षेत्रीय सहयोग संधियों में शामिल रहे। आरसीईपी क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ ऐसे अवसर मुहैया कराती है। सरकार को आरसीईपी को लेकर अधिक समझदारी भरा रुख अपनाना चाहिए। वस्तु व्यापार को उदार बनाने की प्रक्रिया में क्षेत्रवार सुरक्षा उपाय अपनाने चाहिए ताकि घरेलू उत्पादकों के हितों का बचाव किया जा सके। जहां तक सेवा क्षेत्र के उदारीकरण की मुक्त व्यापार पाने का दूसरा तरीका बात है, मौजूदा सीईसीए समीक्षा प्रक्रिया आदि की मदद से जरूरी मुद्दों पर बात हो सकती है।

(लेखिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)

जानिए क्या है भारत और ब्रिटेन के बीच में मुक्त व्यापार समझौता

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वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित संयुक्त आर्थिक एवं व्यापार समिति (Joint Economic and Trade Committee-JETCO) की 14वीं बैठक के दौरान भारत और ब्रिटेन ने आर्थिक संबंधों को मज़बूत करने के उद्देश्य से मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreeme-FTA) के प्रति साझा प्रतिबद्धता की पुष्टि की है।

Shani Sade Sati: शनि की साढ़ेसाती से कुंभ राशि वालों को कब मिलेगी मुक्ति? जानें शनि के दूसरे चरण का असर व उपाय

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंभ राशि के स्वामी ग्रह शनि देव हैं। कुंभ राशि वालों पर साल 2020 से शनि का साढ़ेसाती चल रही है। शनि की साढ़ेसाती से मुक्ति पाने के लिए कुंभ राशि वालों को अभी लंबा इंतजार.

Shani Sade Sati: शनि की साढ़ेसाती से कुंभ राशि वालों को कब मिलेगी मुक्ति? जानें शनि के दूसरे चरण का असर व उपाय

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंभ राशि के स्वामी ग्रह शनि देव हैं। कुंभ राशि वालों पर साल 2020 से शनि का साढ़ेसाती चल रही है। शनि की साढ़ेसाती से मुक्ति पाने के लिए कुंभ राशि वालों को अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा। कुंभ राशि पर अभी शनि की साढ़ेसाती का पहला चरण चल रहा है। जबकि शनि की साढ़ेसाती के तीन चरण होते हैं। जानिए कुंभ राशि वालों को शनि की साढ़ेसाती से कब मिलेगी मुक्ति।

शनि के राशि परिवर्तन का असर-

शनि 29 अप्रैल 2022 को कुंभ राशि में गोचर करेंगे। जिसके कारण इस राशि के जातकों को कष्ट और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ेगा। शनिदेव के कुंभ राशि में प्रवेश करने के साथ ही शनि की साढ़ेसाती का दूसरा चरण शुरू हो जाएगा। इसी के साथ मकर राशि वालों पर इसका अंतिम चरण और मीन राशि वालों पर शनि की साढ़ेसाती का पहला चरण शुरू होगा। जबकि धनु राशि वालों को शनि के प्रकोप से मु्क्ति मिल जाएगी।

शनि की साढ़ेसाती से कुंभ राशि वालों को कब मिलेगी मुक्ति?

कुंभ राशि वालों को 3 जून 2027 में शनि की साढ़ेसाती से मुक्ति मिलेगी। इस दिन शनि का राशि परिवर्तन मेष राशि में हो जाएगा। हालांकि 20 अक्टूबर को शनि अपनी वक्री चाल में मीन राशि में गोचर करेंगे। शनि मीन राशि में 23 फरवरी 2028 तक रहेंगे। जिसके कारण कुंभ राशि वालों पर भी शनि की साढ़ेसाती का असर होगा। ऐसे में शनि की साढ़ेसाती दशा से कुंभ राशि वालों को 23 फरवरी 2028 में मुक्ति मिलेगी।

शनिदेव को प्रसन्न करने के उपाय-

शनि की साढ़ेसाती के दौरान व्यक्ति को शनिदेव के साथ हनुमान जी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इस दौरान शिवलिंग की पूजा करने से भी शनि दोष से मुक्ति मिलती है। पीपल पर जल चढ़ाने से भी शनिदेव प्रसन्न होते हैं। शनिवार और अमावस्या के दिन तेल का दान करने से शनिदेव के बुरे प्रभाव से मुक्ति मिलने की मान्यता है। शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए हर दिन शनि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। कहा जाता है कि शनिवार के जिन लोहे के बर्तन, काला कपड़ा, सरसों तेल, काली दाल, काले चने और काले तिल दान करने से भी शनिदेव प्रसन्न होते हैं।

(इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।)

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